अर्श रोग विवेचना

अर्श रोग विवेचना गंतव्य से आगे,,, पूर्व रूप,,, भोजन में अनिष्ठा, कठिनाई से अन्न का पचना,खट्टी डकारें आना, डकारें अधिक आना,जलन, पेट में अफरा आना,प्यास लगना, पैरों में थकान, पेट में गड़बड़ी शब्द होना, तथा पाण्डु आदि उदर रोग होने की संका होना। रुप,,,,, विभिन्न वर्ण और ना ना प्रकार की आकृति की आकृति वाले मांसाकुरों के साथ पूर्व रूप में कहे लक्षण अधिक स्पष्ट हो जाते हैं। उपशय,,, अर्श रोग में उपशय नही है, परन्तु फोड़ा रक्त पित्त आदि से सापेक्ष निदान करना चाहिए। सम्प्रापति,,,,,मिथ्या आहार विहार से, मलाशय में मल का अधिक मात्रा में संचय होने से, गुदा में क्षत होने से वात, मूत्र और मल उनके वेगो को रोकने से,स्त्रिंयो में गर्भ द्वारा गूद प्रदेश में दबाव पड़ने से,वातादि दोषो से कुपित अपान वायु अधोगत संचालित मल में जाकर गुदा में स्थित बलियों में अर्थात Husston value पर आघात कर वहां त्वचा, मांस और मेद को दूषित कर अर्श की उत्पत्ति करती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अर्श रोग निदान,,,,, प्रलय काल में जब सम्पूर्ण संसार अंधकारमय था और जल ही जल इस पृथ्वी पर था, उस समय अचानक अपने प्रकाश से सम्स्त संसार को प्रकाशित करते हुए भगवान सूर्य का उदय हुआ। सूर्य के उदय से संसार की रचना हुई या यह भी कह सकते हैं कि सूर्य के प्रकाश से आलोकित संसार को देखने पर ज्ञात हुआ कि नक्षत्र राशि अर्थात संसार भिन्न भिन्न आकृतियों में बारह भागो में बटा है, यह आकृतिया नक्षत्रो के आधार पर बनती हैं, और इन्हीं दृश्य आकृतियों को कल्पना के आधार पर नामकरण किया गया,यथा अश्रि्वनी भरणी तथा कृतिका का प्रथम चरण इन नक्षत्रों से मेष की तरह आकृति कल्पित कि गयी,इसी प्रकार अन्य राशियों की भी कल्पना हुई। जन्म समय जो राशि पूर्व में जितने अंश पर उदित होती है।उसे जन्म लग्न राशि कहते हैं। और जितने अंशादि होते हैं, यह स्पष्ट लग्न होती है गोरांग से आगे,,,,,,

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रोग निदान के पश्चात प्रारंभिक अवस्था में कुछ घरेलू उपायों द्वारा रोग की तकलीफों पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। सबसे पहले कब्ज को दूर कर मल त्याग को सामान्य और नियमित करना आवश्यक है। इसके लिये तरल पदार्थों, हरी सब्जियों एवं फलों का बहुतायात में सेवन करें। तली हुई चीजें, मिर्च-मसालों युक्त गरिष्ठ भोजन न करें। रात में सोते समय एक गिलास पानी में इसबगोल की भूसी के दो चम्मच डालकर पीने से भी लाभ होता है। गुदा के भीतर रात के सोने से पहले और सुबह मल त्याग के पूर्व दवायुक्त बत्ती या क्रीम का प्रवेश भी मल निकास को सुगम करता है। गुदा के बाहर लटके और सूजे हुए मस्सों पर ग्लिसरीन और मैग्नेशियम सल्फेट के मिश्रण का लेप लगाकर पट्टी बांधने से भी लाभ होता है। मलत्याग के पश्चात गुदा के आसपास की अच्छी तरह सफाई और गर्म पानी का सेंक करना भी फायदेमंद होता है। यदि उपरोक्त उपायों के पश्चात भी रक्त स्राव होता है तो चिकित्सक से सलाह लें। इन मस्सों को हटाने के लिये कई विधियां उपलब्ध है। मस्सों में इंजेक्शन द्वारा ऐसी दवा का प्रवेश जिससे मस्से सूख जायें। मस्सों पर एक विशेष उपकरण द्वारा रबर के छल्ले चढ़ा दिये जाते हैं, जो मस्सों का रक्त प्रवाह अवरूध्द कर उन्हें सुखाकर निकाल देते हैं। एक अन्य उपकरण द्वारा मस्सों को बर्फ में परिवर्तित कर नष्ट किया जाता है। शल्यक्रिया द्वारा मस्सों को काटकर निकाल दिया जाता है।

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Nice update Dr.

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Nice Update about Radha Roga.

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Valuable post

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जानकारी पुर्ण

देश काल बल आयुर्वेद चिकित्सा में विचारणीय

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