मल्लसिन्दूर।।

आदरणीय चिकित्सक । आज हम बात करेंगे एक ओर बहुमूल्य औसध मल्लसिन्दूर के बारे मे। Description- मल्लसिन्दूर तैयार किया जाता है शुद्ध पारद गंधक जिसे हम कज्जली भी कहते है, रस करपुर एवम शुद्ध संखीया के संयोग से। एवम घृतकुमारी के रस की भावना देकर। मात्रा एवम अनुपान - आधी से एक रत्ती दिन मे दो बार मधु एवम अदरक के रस के साथ या रोगानुसार अनुपान। गुण एवम उपयोग - यह कल्प अत्यंत तीक्षण एवम उष्णवीर्य है अतः पित्त प्रकृति के पुरुषो को यह बहुत हलकी मात्रा मे सौम्या औषदो के साथ जैसे प्रवाल पिष्टी आदि मिलाकर देना चाहिए। वात एवम कफ के विकारो मे यह तीर की तरह शरीर मे प्रवेश कर शीघ्र हि उत्तम फल दिखाता है। जंतुघन गुण के कारण रक्त मे घुसे मलेरिया हैजा सिफिलिस आदि के कीटाणु को जल्दी नष्ट करता है । तेज बुखार मे इसे नही देना चाहिए। आतसक के लिए तो यह न्यूसलवर्सन इन्जेक्शन हि समझे। पक्षघात आमवात धनुस्तम्भ आदि वात रोगो मे एवम कफ सम्बन्धी कास स्वास न्यूमोनिया उरसतोय डब्बा आदि मे आशातीत लाभ होता है। स्त्रियों के हिस्टीरिया रोग मे इसका बहुत जल्दी प्रभाव पड़ता है। एक सप्ताह मे हि दौरे समाप्त हो जाते है। बुढ़ापे की दुर्बलता एवम पुराने दमे मे यह अमृत के समान गुण कारी है। हस्तमैथुन से नामर्द हुए मनुष्यो को इसे अवश्य सेवन करना चाहिए। शरीर बल वीर्य वृद्धि मे इसका सेवन किया जाता है । यह थोड़े दिनों मे हि शरीर को पुष्ट बनाकर मैथुन शक्ति को बढ़ाता है। इसमे प्रवाल पिष्टी मिलाकर देने से गर्मी मालूम नही होती। धन्यावाद।। अगर कोई गलती हो तो ठीक करे एवम अन्य योग भी बताये। जय आयुर्वेद।

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IT WAS GREAT INFORMATION AND VERY EDUCATIONAL POST YOU SHARING US THANKS @Aazad Dhimaan SIR

Thanks for sharing sir

Informative

Thank you doctor
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Very informative

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