आयुर्वेद चिकित्सा से श्वास रोग का उपचार संभव है, आयुर्वेद चिकित्सक

आयुर्वेद चिकित्सा से श्वास रोग का उपचार संभव है, आयुर्वेद चिकित्सक युक्ति पूर्वक रोग-रोगी का परीक्षण करके सही निदान करके औषधियों का चयन करे व यदि रोगी सही तरह से पथ्य पालन करे व नियम से औषधियों का सेवन करे तो श्वास रोग से पूर्ण रूप से स्वस्थ हो सकता है। देखिये एक श्वास रोगी की चिकित्सा। श्वास (अस्थमा/सांस फूलना) रोग एक गंभीर रोग माना जाता है, सामान्यतः इस रोग से पीड़ित रोगी जीवन भर इन्हेलर या नेब्युलाइज़र पर निर्भर रहता है,सांस फूलने के साथ यदि रोगी को सर्दी, खांसी की समस्या भी रहती है तो इस रोग को ब्रोन्कियल अस्थमा या आयुर्वेद की भाषा में तमक श्वास कहते है। इस रोग से पीड़ित एक महिला रोगी 3 वर्ष पूर्व हमारे यहाँ आयी थी, जिनकी उम्र लगभग 45 वर्ष थी, जिन्हें थोड़ा सा भी चलने पर सांस फूलना, बलगम के साथ खांसी व जुकाम भी था, दिन में 5 - 6 बार इन्हेलर व कभी-कभी नेब्युलाइज़र भी लेना पड़ता था, एक-दो बार गंभीर स्थिति में रोगी अस्पताल में भर्ती भी हो चुकी थीं, करीब 20 वर्षों से तमक श्वास से पीड़ित थीं, आयुर्वेद में एक अंतिम उम्मीद के साथ आयी हुई थीं। जिस समय हमारे यहाँ आयी थीं उस समय उनके Pulmonary Function Test (PFT) में यह लक्षण थे: 1.Moderate obstructive defect., 2.Poor response to bronchodilators, 3. Air trapping., 4.Mild-to-moderate diffusion impairment, 5.Possible obstructive sleep apnea. रोग की तीव्रता का काल रात्रि को या सुबह के समय में अधिक था, धुआं, धूल, तेज़ महक से रोगी की परेशानी बहुत अधिक बढ़ जाती थी, मौसम में परिवर्तन के समय में भी रोगी को तकलीफ अधिक होती थी, तमक श्वास के लगभग अन्य सभी शारीरिक लक्षण भी मौजूद थे। रोगी को आयुर्वेद चिकित्सा के आरम्भ के 1 माह के अंदर ही इन्हेलर व नेब्युलाइज़र के प्रयोग में कमी आनी आरम्भ हो गई, लगभग 1 वर्ष की चिकित्सा के बाद रोगी को कभी भी इन्हेलर व नेब्युलाइज़र नहीं लेना पड़ा, मौसम में परिवर्तन व धूल-मिट्टी में जाने की स्थिति में तकलीफ कभी-कभी बढ़ती थी लेकिन नियमित पथ्य सेवन व औषधियों के प्रयोग से लगभग 30 माह के बाद रोगी अब न तो कोई भी आयुर्वेद की दवा ले रही है और न ही किसी तरह की एलोपैथ की दवा लेनी पड़ रही है। कुछ माह पूर्व का PFT टेस्ट भी यहाँ संलग्न है जो की अब बिलकुल सामान्य है। इस रोग में चिकित्सा सूत्र: निदान परिवर्जन, वात-कफ शमन, लंघन, पाचन, रसायन औषधि सेवन। इस रोगी का औषध व्यवस्था पत्र: शट्यादि चूर्ण (भारंगी, बच, कचूर, शुंठी, मरीच) - {आयुर्वेद सार संग्रह का एक योग}, तालिसादि चूर्ण, अभ्रक भस्म, गिलोय सत्व, हरिद्रा खंड, पुष्कर मूल चूर्ण, श्वास कुठार रस, लक्ष्मी विलास रस नारदीय, कनकासव, षड बिंदु तेल नस्य व च्यवनप्राश। (औषधियों की मात्रा का निर्धारण चिकित्सक स्वयं से करें) अपथ्य: वात-कफ वर्धक आहार-विहार जैसे: दही, मट्ठा, चावल, अचार, खटाई, चिकनी चीज़े, मैदे से बने आहार, केला, अंगूर, आम, अमरुद जैसे शीतल फलों का निषेध, ठंडी चीज़े, पंखे, कूलर, ए. सी. की सीधी हवा से बचें। पथ्य: सब्जियों का सूप, गुनगुने पानी का सेवन, मुनक्के का प्रयोग, मूंग दाल, खिचड़ी, लौकी, तुरई, परवल जैसे लघु आहार का सेवन । - डॉ.अभिषेक गुप्ता (दिल्ली) Brahm Ayurveda www.brahmayurved.com

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