कुष्ठ - 1......

अपनी आज की post में कुष्ठ के बारे में चर्चा करूंगी। कुष्ठ, जिससे साधारण भाषा में आम जन leprosy का ग्रहण करते हैं किंतु कुष्ठ का अर्थ सिर्फ leprosy से नहीं है। कुष्णाति वपु: इति कुष्ठम्।। अर्थात् आयुर्वेद में त्वचा में होने वाली किसी भी प्रकार की विकृति को कुष्ठ कहा है।त्वचा की यह विकृति एक छोटी फुंसी होना,त्वचा में विवर्णता होना,दाद होना से लेकर गलित कुष्ठ(leprosy) तक कुछ भी हो सकता है। चूंकि मानस भाव भी व्याधि का निदान होता है इसलिए व्यवहार में कुष्ठ शब्द का प्रयोग न कर त्वक् विकार ऐसा प्रयोग किया जाता है, जिससे रोगी के मानसिक स्तर पर कोई बुरा प्रभाव न पड़े; लेकिन आयुर्वेद के scholar होने के नाते जब हम किसी आयुर्वेद के ज्ञाता से चर्चा करें तो कुष्ठ शब्द ही प्रयोग करना चाहिए। च.सू.25/40 "दीर्घरोगाणां कुष्ठं" ऐसा बोलकर कुष्ठ को चिरकाल तक बना रहने वाला रोग कहा है और इसकी गणना अष्ठ महारोगों में की गई है। अ.हृ.नि.14 "त्वच: कुर्वन्ति वैवर्णर्यं दुष्टा कुष्ठमुशन्ति तत् " त्वचा को दूषित कर उसमें विवर्णता करने वाले रोग को कुष्ठ कहते हैं। चक्रपाणि - सर्वकुष्ठेषु प्रथमं त्वच्यमेव वैकृतं भवति विशेषेण। पश्चाद्वैशेषिकी दुष्टि: कालप्रकर्षाद्रक्तादिषु भवति।। सभी कुष्ठों में सर्वप्रथम त्वचा में ही विकृति होती है तत्पश्चात् चिकित्सा न करने से काल के प्रभाव से रक्तादि धातुएं भी विकृत हो जाती है। किस प्रकार कुष्ठ कालान्तर में रक्तादि धातुओं में व्याप्त हो जाता है इसका वर्णन करते हुए आचार्य सुश्रुत निदान स्थान 5/19-20 में कहते हैं कि जिस प्रकार उत्पन्न हुई वनस्पति काल की अधिकता तथा वृष्टि से बढ़कर जड़ के द्वारा भूमि में जम जाती है उसी प्रकार से प्रथम त्वचा में उत्पन्न हुआ कुष्ठ चिकित्सा न करने से कुछ समय पश्चात क्रम से रक्तादि धातुओं में व्याप्त हो जाता है।

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Dear Dr. Km Bhawana, Nice paribhash about Kustha.
Thank you doctor
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