Sangrahani Roga

Dear Doctors pls share your best opinion for treatment of sangrahani Roga. Pls share your experience in case of sangrahani with treatment. Warm Regards

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अतिसार के निवृत्त हो जाने पर या आरम्भ से ही अपथ्य सेवन करने वाले दुर्बलाग्नि पुरुष की जठराग्नि वात आदि दोषो से पुनः अधिक विकृत हो कर ग्रहणी को भी विकृत कर देती है। इस प्रकार प्रकुपित वात आदि दोषो से किसी एक,दो, अथवा तीनों से विकृति को प्राप्त हुई ग्रहणी खाएं हुए पदार्थ को आमावस्था में अथवा कदाचित पक्कवस्था में भी अनेक बार त्यागती है। इस से मल दुर्गन्धित, कभी बद्द वातानुबन्ध से और कभी द्रव।।पित्तानुबंध से।।रुप में बार बार पीड़ा के रहित निकलता है। आयुर्वेद में इस को ग्रहणी रोग संज्ञा प्रदान की है। ग्रहणी रोग पाचन संस्थान गत रोगो में प्रमुख है। अन्य रोगो के समान इस का भी प्रधान हेतु मन्दाग्निता है।

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@Dr. D. P. Singh सर कृपया संग्रहणी रोग पर प्रकाश डाले

पुत्र डॉ हेमंत अधिकारी ग्रहणी रोग निदान हेतु पर विचार कर दिया है। चिकित्सा संबंधी योग,,,, रोगी का अग्नि बल बुद्धि करने वाले कषायो का प्रयोग करें और फिर अतिसार के निमित्त चिकित्सा संबंधी योग पर विचार किया जाएगा। जैसे,, ग्रहणी कपाट रस बिल्व चूर्ण बिचोरा नींबू और शहद।
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