रोगाः सर्वेऽपि मन्देऽग्नौ सुतरामुदराणि तु।

आयुर्वेद चिकित्सक होने के नाते यह आप सब लोग अच्छे से जानते हैं कि अग्नि मंद होना या मंदाग्नि बहुत से रोगो का कारण मानी गई है। इसलिए किसी भी रोग की चिकित्सा करते समय हम अग्नि का विचार अवश्य करते हैं और करना भी चाहिए। इसलिए अग्नि का चिकित्सा में विशेष स्थान होने के कारण आज ही इस पोस्ट में विभिन्न हेतु से होने वाली अग्नि मंद में क्या क्या करना चाहिए यह बताने का प्रयास कर रही हूं अगर इसमें कोई गलती हो तो सीनियर डाक्टर उसमें सुधार करें। रौक्ष्यान्मन्दे पिबेत्सर्पिस्तैलं वा दीपनैर्युतम्। यदि रूक्ष चीजों का सेवन करने से अग्नि मंद हो रही है तो दीपनीय द्रव्यों जैसे पिप्पली,चित्रक, अजमोदा,हिंगु,अदरख आदि से सिद्ध घी तथा तैल का प्रयोग कर अग्नि को दीप्त करना चाहिए या दीपनीय द्रव्यों के चूर्ण को घी तथा तैल के अनुपान से रोगी को खाने के लिए देना चाहिए। अतिस्नेहात्तु मन्देऽग्नौ चूर्णारिष्टासवा हिताः । यदि स्निग्ध पदार्थों का अतिमात्रा में सेवन करने से या पंचकर्म चिकित्सा के पहले स्नेहन कर्म में स्नेह की अधिक मात्रा का प्रयोग करने से अग्नि मंद हो तो चूर्ण,आसव,अरिष्ट का प्रयोग करना चाहिए। उपवासाच्च मन्देऽग्नौ यवागूभिः पिबेद्घृतम्। यदि उपवास करने से अग्नि मंद हुई हो तो मंड,पेया,विलेपी,यवागू आदि में घी डालकर रोगी को पिलाना चाहिए। Ref. - चरक चिकित्सा १५/२०५

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पुत्री डॉ भावना भट्ट आप क्या समझाना चाहती है।

सर मैं विभिन्न हेतुओं से जो अग्नि मंद हो जाती है उसकी चिकित्सा कैसे करें यह समझाने का प्रयास कर रही हूं। क्योंकि आयुर्वेद में सभी रोगो कारण मंदाग्नि को माना गया है।
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Helpful post

Thank you doctor
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