#Ayurveda and #Allopathy

●मरीज से सिम्पथी तो कारगर हर पैथी● इन दिनों इलाज के लिए आयुर्वेद और एलोपैथी के एक्सपर्ट आमने-सामने हैं। कोरोना के इलाज से शुरू हुई यह लड़ाई कई और दूसरी बीमारियों के इलाज पर आ गई है। इस बारे में हमारी राय एकदम साफ है। तमाम बीमारियों के इलाज के लिए मॉडर्न मेडिसिन (एलोपैथी) और आयुष की तमाम चिकित्सा पद्धतियों को मिलजुलकर काम करना होगा। आइए, जानते हैं कि इन दिनों सोशल मीडिया पर किन-किन बिंदुओं को लेकर इस मुद्दे पर बहस हो रही है: ●आयुर्वेद ◆खूबियां... - एलोपैथी का कहना हैः तुम बीमार पड़ो, मैं ठीक करूंगा। आयुर्वेद कहता है, मैं तुम्हें बीमार ही नहीं होने दूंगा। आयुर्वेद शास्त्रों में 90 प्रतिशत हिस्सा लाइफस्टाइल से संबंधित है। सिर्फ 10 प्रतिशत हिस्सा औषधि का है। - आयुर्वेद एक विशाल चिकित्सा विज्ञान है, केवल चूर्ण-चटनी तक सीमित नहीं। आयुर्वेद के अपने मूल सिद्धांत हैं जो पंच महाभूत और त्रिदोष पर आधारित हैं। - शरीर रचना (Anatomy), शरीर क्रिया (Physiology), निदान (Pathology), चिकित्सा (Treatment), द्रव्य गुण ( Materia Medica), भैषज्य कल्पना एवं रस शास्त्र (Pharmaceutical Sciences) की आयुर्वेद की बहुत बड़ी-बड़ी अपनी किताबें हैं जिनमें अथाह औषधियों के गुण-कर्म और फार्मूले भरे पड़े हैं जो BAMS के विद्यार्थियों को पांच साल के कोर्स में पढ़ाए जाते हैं। इसके समानांतर एलोपैथी का अधिकतम कोर्स भी उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा है जिससे शरीर और रोग को ठीक प्रकार से समझने में कोई परेशानी न हो। आयुर्वेद का रस शास्त्र एक ऐसा अद्भुत रसायन शास्त्र है जिसमें संसार की हीरे जैसे कठिनतम पदार्थ, लोह, सोना, चांदी और पारे जैसी धातुओं को भस्म में परिवर्तित कर शरीर के लिए बिना किसी दुष्प्रभाव के प्रयोग में लाने का सामर्थ्य है और ये औषधियां बहुत त्वरित गति से शरीर में काम करती हैं। - आयुर्वेद शास्त्र सिर्फ आयुर्वेद चिकित्सकों की धरोहर नहीं है, हर भारतीय, हर इंसान की धरोहर है। देश के एलोपैथिक डॉक्टरों भी धरोहर है। चरक, वाग्भट्ट, नागार्जुन उनके भी पूर्वज हैं। सुश्रुत को तो वे भी फादर ऑफ सर्जरी मानते हैं। ◆कमियां... - आयुर्वेदिक डॉक्टरों को एलोपैथी में अगर इतनी कमियां दिखती हैं तो वे क्यों एलोपैथिक दवाएं लिखते हैं और ऐसा करने की छूट क्यों मांगते रहते हैं? - आयुर्वेदाचार्य और योग गुरु भी जब सख्त बीमार पड़ते हैं तो क्यों एलोपैथी वाले हॉस्पिटल्स में एडमिट होते हैं? - आयुर्वेद हजारों सालों से है। ऐसे में जब चेचक, पोलियो, प्लेग आदि जैसी बीमारियां आईं तो उन्हें आयुर्वेद ने नहीं, एलोपैथी ने काबू में किया। - एलोपैथी एक निरंतर विकसित हो रही विधा है जो रोज़ अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए सुधार करती चलती है। यह प्राचीन मानवों द्वारा लिखी हुई पुस्तकों पर आधारित जड़ विद्या नहीं। - आयुर्वेद अभी इलाज का पुरातन तरीक़ा है। इसमें सुधार और रिसर्च की ज़रूरत है। आयुर्वेद दवाओं को क्रूड फॉर्म में देता है और इसीलिए मात्रा का निर्धारण भी ठीक से नहीं होता। क्रूड फॉर्म में किसी भी चीज को लेने के फायदे कम और नुकसान ज्यादा हैं। - कई देसी दवाओं से इलाज के बारे में बताया गया है, लेकिन उसे कितनी मात्रा इसका कोई निर्धारण नहीं है। जैसे एलोवेरा जूस का इस्तेमाल कई बीमारियों को ठीक करने में बताया जाता है। लेकिन जूस कब और कितनी मात्रा में लेना है, इसका कोई निर्धारित पैमाना नहीं है। ●एलोपैथी ◆खूबियां... - मेडिकल सेक्टर में मची लूट सिस्टम की नाकामी है न कि चिकित्सा पद्धति की। दुनिया में कई देश ऐसे भी हैं जहां स्वास्थ्य सेवाएं या तो मुफ्त हैं या उन पर नाम का खर्च आता है क्योंकि उन पर सरकार का नियंत्रण होता है। - बचपन में कई बीमारियों से बचाने के लिए टीके लगाए जाते हैं और मरते दम तक वे बीमारियां पास नहीं फटकती हैं। आयुर्वेद में ऐसा कोई टीका नहीं है। - शुगर के मरीज को इंसुलिन दिया जाता है, जिसके कारण उसकी शुगर कंट्रोल में रहती है। यह एलोपैथी की ही देन है। - एड्स बेशक जड़ से खत्म न हुआ हो, बावजूद इसके एड्स के काफी मरीज अपनी बेहतर लाइफ जी रहे हैं और यह एलोपैथी से ही संभव हुआ है। - गर्भवती महिलाओं की जब डिलिवरी होती थी तो डिलिवरी के समय काफी महिलाओं की मृत्यु हो जाती थी। सिजेरियन पद्धति से गर्भवती महिलाओं की मृत्यु दर में काफी कमी आई है। - मॉडर्न मेडिसिन आने से पहले जब आयुर्वेद था तो उस समय 1 साल की आयु तक आते-आते 1000 में से 120 बच्चे मर जाते थे। अब करीब 28 बच्चे ही मरते हैं। ऐसे बच्चों को बचाना एलोपैथी से ही संभव हुआ है। ◆कमियां... - एलोपैथी दवाओं के गंभीर साइड इफेक्ट हैं। अधिकांश दवाएं एक बीमारी को ठीक कर दूसरी बीमारी दे देती हैं। - गंभीर रोगों जैसे कैंसर आदि की दवाएं काफी महंगी होती हैं। ये दवाएं आम आदमी की जेब पर भारी पड़ती हैं। अगर कोई इन दवाओं को खरीदता है तो या तो वह दिवालिया हो जाता है या दिवालिया होने की कगार पर आ जाता है। - प्रफेसर पीटर सी गोत्जसे ने अपनी किताब Deadly Medicine and Organized Crime में फार्मा उद्योग को सर्वाधिक कातिल उद्योगों में से एक बताया है। किताब में फार्मा उद्योग की तुलना तम्बाकू उद्योग से की गई है। किताब के मुताबिक फार्मा कंपनियां रिसर्च के नाम पर दवाओं की ऊंची कीमत रखकर लोगों को आर्थिक रूप से लूटती हैं। - एक ही केमिकल से बनी अलग-अलग कंपनियों की दवाओं की कीमत में कई गुने तक का फर्क देखा जा सकता है। यह फर्क 10 या इससे भी ज्यादा गुना का हो सकता है। बस, ब्रांड की वजह से दवा की कीमत बहुत ज्यादा हो जाती है, जबकि काम कम कीमत वाली भी वही करती है। - कोरोना में एलोपैथी दवाओं का एक दूसरा रूप सामने आया है। अस्पतालों में कोरोना मरीजों का लाखों रुपये का बिल बन रहा है। जब कोरोना वायरस को मारने की कोई एलोपैथिक दवा है ही नहीं तो बिल लाखों में क्यों बनाया जा रहा है? - कोरोना वायरस को मारने में स्टेरॉइड का इस्तेमाल किया गया, जो अब ज्यादातर उन लोगों में फंगस बना रहा है। ●किसी भी पैथी के न बनें अंधसमर्थक मौजूदा दौर में हर पैथी (आयुर्वेद, एलोपैथी, होम्योपैथी, यूनानी आदि) की अपनी अहमियत है। यहां किसी को भी कम नहीं आंका जा सकता। समझदारी इसी में है कि मरीज को इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि उसे कब आयुर्वेद की मदद लेनी है और कब एलोपैथी या दूसरी पैथी की। बेहतर यही है कि किसी को भी किसी भी पैथी का न तो अंधसमर्थक होना चाहिए और न ही अंधविरोधी। दरअसल मेडिकल सेक्टर एक दवा मंडी की तरह है जहां सब अपना-अपना माल बेच रहे हैं। ऐसे में मरीज को यह तय करना है कि उसे क्या खरीदना है। उसे अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए अपने इलाज के लिए अच्छा डॉक्टर और अच्छी दवाइयां चुननी चाहिए। बेहतर होगा कि हर पैथी का लाभ उठाया जाए। ●समय पर हर पैथी का अपना महत्व समय पर हर पैथी का अपना महत्व होता है। अगर किसी शख्स का एक्सिडेंट हो जाए और उसकी कोई नस फट जाए तो तुरंत इलाज के लिए एलोपैथी ही काम आएगी न कि आयुर्वेद। वहीं अगर खांसी या बुखार है तो एलोपैथी समेत किसी भी पैथी की दवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं। तुरंत इलाज या सर्जरी के लिए एलोपैथी बेस्ट है। एलोपैथी और आयुष चिकित्सा पद्धतियां एक दूसरे की पूरक हैं, दुश्मन नहीं। ऐसे में दोनों की कमियों और सीमा को स्वीकार करने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। इसलिए आयुर्वेद से जुड़े लोगों को न तो एलोपैथी पर सवाल उठाने चाहिए और न ही एलोपैथ से जुड़े डॉक्टरों को योग, आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी पर। (नोट: ये तमाम बिंदु सोशल मीडिया पर हो रही बहस पर आधारित हैं।) #ayurveda #Allopathy

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बात केवल इतनी सी है कि रोगी के जीवन को कैसे सुरक्षित रखा जाए/केसे कम से कमतर खर्च में लाभ हो। साईड ईफेक्ट के बिना रोगी स्वस्थ रहें।ऐसा भी न हो कि नमाज़ पढ़ने गये थे और रोजे गले पड़े वाली कहावत हो जाए ? उदाहरण के रूप में इलाज कोरोना का किया परन्तु जान बचाने के स्टेराईड व आक्सीजन दें कर जान तो बच गयी, परन्तु साथ में फंगस का उपद्रव जान का दुशमन ओर गले पड़ा ? मेरा 100% मानना है कि ऐसी मोतों के लिए एक भी माडर्न पैथी का चिकित्सक जिम्मेवार नहीं है । कारण : जिस प्रकार का ग्यान प्राप्त किया है,और जो नोरम माडर्न पैथी की चिकित्सा व दवाऔं के प्रयोग हेतू गाईड लाईन दी गई है ,उन्हीं सिद्धान्तों पर ही तो चिकित्सा करेंगें ?इस में डाक्टर कैसे कसुरवार हैं ? वैसे एलोपैथी दवाऐं कोई भी डाक्टर नहीं बनाता,फार्मा वैग्यानिक दवा बनाते हैं और रोयल्टी ली जाती है। इस के उल्ट आयुर्वेदिक दवाऐं पहले से ही मानव पर टेस्टिड है,और कोई भी वैध/फार्मेसी अनुमोदित संहिताऔं से पढ़ कर दवा बनाते हैं और कोई भी रोयल्टी नहीं देनी पड़ती । सो बात की एक बात की इस मर्म को समझ कर दोनों चिकित्सक भाई वर्ग को नियमानुसार जनहित में मिल कर चलना चाहिऐ। हां एक बात और 2+2=4 सभी को पता है,मगर कोई 5 कह कर माने ही नहीं तो परिणाम सभी को पता है।डा.श्याम सुन्दर जी प्ररस्तूति प्रयास का धन्यवाद।

Thank you doctor
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Thanx for sharing such an illustrative and meaningful post.Congrats Dr. Shyam Sunder Pandey Sir.

Thank you doctor
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Super

Thank you doctor
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सही बात हैं। सारी पैथी अपनी अपनी जगह बेस्ट हैं।

Thank you doctor
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Nice post...

Thank you doctor
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Very nice explanation. Thank you doctor

Thank you doctor
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Explanatory and meaningful post.

Thank you doctor
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Bahut hi Accha H

Thank you doctor
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